भपंग वादक जहुर खाॅ मेवाती का मेवाती लोक

कला मे योगदान और जीवन परिचय भपंग वादक जहुर खाॅ मेवाती का जन्म 1941 को पिता कंवर नाथ, माता महकबी के कोख से लपाडा जिला अलवर मे हुआ।
जहुर खाॅ के पिता जोगिया सारंगी के अच्छे बजवैया थे। बडे भईया सारंगी बजाते थे। सकुर खाॅ बात किस्सा कथा वाचक के रूप मे कहते थे। जहुर खाॅ के पूर्वज- दादा दिलदार, दादा नूरा, दादा कलवा उनके समयनाथ, कंवरनाथ समय नाथ के 2 लडके अलीषेर व जुम्मा तथा कंवरनाथ के 3 लडके हुसैना नाथ, सकुर खाॅ, जहुर खाॅ और जहुर खाॅ के 2 लडके उमरफारूख, महमूद खाॅ तथा उमरफारूख के 2 लडके युसुफ खाॅ व जाकिर खाॅ तथा महमूद खाॅ का एक लडका अमन खाॅ जहुर खाॅ का बचपन बहुत गरीबी मे बीता बचपन मे ही रोजी रोटी के जुगाड मे भपंग को अपना पेषा चुना 10 साल की उम्र मे अलवर के न्यू तेज सिनेमा के सामने भपंग बजाकर बीडी बेचा करते थे।

अलवर के कम्पनी बाग मे दिलीप कुमार, जगदीष सेठ के साथ अलवर आये हुए थे। उन्होने भपंग सुना तो अपने साथ जहुर खाॅ को मुम्बई ले गये फिल्म गंगा जमना के गीत छलिया रे छलिया रे मन मे हमार तोरी नजर धस गई मे भपंग बजवाई। तथा आंखे फिल्म के मषहुर गीत दे दाता के नाम तुझ को अल्ला रख्खे मे तथा नया दोर इत्यादि फिल्मो मे भपंग वादन किया।

17 साल हाजी युसुफ आजाद कव्वाल के साथ भपंग बजाते हुऐ मान भाई तबला वादक के साथ जुगलबंदी करने लगे। 5 साल एच.एम.बी रिकार्डिंग कम्पनी दिल्ली स्थाई कलाकार बनकर रहे।
1980 मे श्री मान कोमल कोठारी से हरिषचन्द दीक्षित ने मिलाया तो लोक कला के क्षेत्र मे भपंग को स्थापित किया।
जहुर खाॅ ने 70 देषो मे भपंग वादन किया। 16 मई 2007 को जहुर खाॅ का निधन हो गया। जहुर खाॅ 18 वी पीढी मे भपंग वादन कर रहे थे।

योगदानः
मुस्लिम जोगी समाज मे जो गाना बजाना अपना वजुद खो रहा था। जहुर खाॅ मेवाती ने उन्हे पुनः स्थापित कर दिया। जहुर खाॅ के साथी कलाकारो ने 14 नवम्बर 2007 को जहुर खाॅ मेवाती भपंग कला एवं षिक्षा समिति का गठन किया। समिति ने मेवात मे लुप्त हो रही कलाओ को बचाने के लिए कई कार्य षालाओ का आयोजन किया व पारम्परिक कलाओ को बचाने के लिए नये षिश्यो को तैयार करना। जहुर खाॅ मेवाती के नाम से मेवात के स्थापित कलाकारो का सम्मान किया जाता है।

आज के हालात
मेवात अंचल मे जोगिया सांरगी बजाने वाले 50-60 साल से कम उम्र के लोग नही है। जिजमानी प्रथा भी खत्म होती जा रही है। लोग गाना बजाना सिखने से कतरा रहे है। अब जो भी मेवात मे पारम्परिक गाना बजाने को आगे बढा रहे है। उनमे जहुर खाॅ के साथी, षिश्य पुत्र तथा पोत्र है।
पुत्र उमरफारूख,महमूद खाॅ षिश्यो मे जुम्मे खाॅ, गफरूद्धीन, नूरद्धीन, असरूद्धीन, कमरूद्धीन तथा पोत्रो मे युसुफ खाॅ, जाकिर खाॅ, अमन इत्यादि है।

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