सृष्टि की रचना
छः;1द्ध अब्वल सोच अल्लाह,पहल माबुद मनाउ
मिटा जिक्र का फिकर,गीत हजरत का गाउ
मेरो दिल उमंगे दरयाव,हुकम मुरसद सु चहाउ
दौः;2द्ध मुरसद ने अग्या देई,खुलगे ज्ञान बाजार
जिक्र मुहम्मद पाक को याय सुनयो कान लगार
छः;3द्ध सुनयो कान लगार अमल कुछ याको करले
जाने दिनी जान,ध्यान कुछ वाको धरले
उतरे चाहे पार,नबी का कलमा भरले
दौ;4द्ध धरण नही अम्बर नही,ना थे जिन्द मलायक हूर
सब सु पहले रब ने अपना दियो नबी कू नूर
छः;5द्ध दियो नबी कू नूर,रहयो मुट्ठी मे प्यारे
वा मुट्ठी के बीच बितगे सत्तर हजारे
दौः;6द्ध रूख जडन्ता मानता रब वो बी दिये लगाय
कर सुरत ताउस की हजरत वापे दियो बिठाय
छः;7द्ध वापे दियो बिठाय बरस रहयो नूर सवाया
नबी मही दिन तरफ एक दिन आप लखायो
नूर गयो सरमाय पसीनो अंगज आयो
मता देख के जचा रब के ई मन भायो
मुहंढो दियो शीप को जोड बीच मे नबी बिठायो
वाई शीप के बीच रब कु शीश नमायो
ना हो सुरज भान कुरानन वेदन पायो
दौः;8द्ध जा दिन धरण नही अम्बर नही,ना थे सुरज भान
पेशानी पे कुतुब हो जा दिन हुऐ उजाडे भान
छः;9द्ध हुऐ उजाडे भान चाॅदनी जल मे पुरी
वही फरिस्ते चार रब के कहीये नूरी
मैं कर अजाजील संमद मे चुबकी मारे
हु सु लायो मुट्ठी बांध, हुयो उपर जल प्यारे
वा मुट्ठी की धरण रचा दी रचना सारे
दौः;10द्धसिपत करू वा रब की जाने जल पे धरी जमीन
नू सातु अस्मान को कीनो जब्राहील अमीन
छः;11द्ध कीनो जब्राहील अमीन फिरे जो सारी कल में
जाकु हुक्म दिये माबुद वाय पहुचावे पल में
दौः;12द्ध सात दीप चैदह तबक बनाये जब सातु अस्मान
सभी खेल जा दिन रचा,जा दिन कहदी कुन्न सुबान
छः;13द्ध रच दिये चैदह तबक,कहा एक कुन्न कहाॅ सु
पोन झकोडा लेय,जमी जब फिरी हवा सु
धरती उपर मेर गेर दिये पर्वत जासु
सबसु ले लिये वचन,फिर मचका ना वाहसु
दौः;14द्ध सिपत करू वा रब की,साई मेरो ऐसो पाक सुबान
वाही घडी वाही ठोर मे,बना दिये जन्नती मकान
छः;15द्ध बना दिये जन्नती मकान,लगादी बाग बहाली
रिमझिम बरसे नीर हूर जब हुई बहाली
मेरा वा साई को नूर फिरो हो डाली डाली
दौः;16द्ध सिपत करू वा रब की, साई मेरो ऐसो पाक सुबान
वा जन्नती मकान का बना दिया मोर सर्प दरवान
छः;17द्ध बना दिया मोर सर्प दरवान,बादशाह जमी उमर को
वाने दिनो ना भेद किसी कु अपना घर को
दौः;18द्ध फरिस्तान कु रब ने, दिनो हुकम सुणाय
जब सातु अस्मान की याने मिट्ठी लई मगाय
छः;19द्ध मिट्ठी लई मगाय इक्कठी हू गिरवाई
वाही घडी वाही ठोर हुई दुणी रूसवाई
दौः;20द्ध मट्टी उपर बरस गो वाकी बडी रहमत को मेंह
इतना काम बणायके मुनीरा बना दी वा दादा आदम
की देह


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