मेवात

राजस्थान प्रदेष मे कई प्रकार के जोगी पंथ
है। राजस्थान को कई क्षेत्रो मे बांटा गया है
जो रजवाडो के समय से ही जाना जाता है।
दोहाः- मारवाड मेवाड हाडौती, ढुंढाडी
षेखावाटी
छः सैक्टर राजस्थान मे ब्रज संग है
मेवाती
मेवात अंचल पूर्वी राजस्थान के दो जिले
अलवर,भरतपुर की कुछ तहसीले आती है
जैसे
लक्ष्मणगढ,राजगढ,किषनगढ,तिजारा,रामगढ,अ
लवर तथा भरतपुर जिले मे कांमा और
पहाडी ब्रज नगर कुछ गांव डीग तहसील के
भी मेवात अंचल मे आते है। हरियाणा के
जिले गुडगावां,फरीदाबाद,पलवल और नूहं
मेवात के जिलो मे मेवात अंचल है। इन
क्षेत्रो मे मेव जाति निवास करती है। मेव
बाहुलय क्षेत्र होने के कारण तथा अरावली
पर्वत माला का अंतिम छोर होने के कारण
मेवांत होता था। अब इसे मेवात के नाम से
जाना जाता है। मेवात क्षेत्र के बारे मे
दोहाः- कामां पुन्हाना पहाडी,झिर मे षंकर
सूरदास
तिजारा लक्ष्मणगढ रामगढ, षेरपुर लालदास
नूहं सोहना ताउडू और फरीदाबाद
गुडगावां अलवर बीच मे मेरी बसे मुलक मेवात

 

मेवात मे मेवाती लोक गीत जन्म से मृत्यु तक है।
इसके अलावा रतवाई गायन,दाहा,ख्वाजा का सोयला,भात
के गीत,कबीर भजन,कबीर का उल्टा ज्ञान इत्यादि है।
साथ ही षिवजी का ब्याहवला,नरसी का भात,गोपी चन्द,
राजा भर्तहरी,हीर रांझा,दुल्ला धाडी,भूरा बादल,जहार
पीर,का गायन कर
जाठ,गुर्जर,सैनी,राजपुत,बनिया,यादव,वर्मा,मीणा इत्यादि
सभी जातियो मे घर घर जाकर भिक्षा मांग कर जीवन
यापन करते है।
जोगी सर्प पकड कर लाते थे। जब कभी किसी को सर्प
खा जाता था तो उसका इलाज भी करते थे। पषुओ की
दवाई भी देते थे। फसलो मंे लगने वाले कीट को भी मंत्रो
द्धारा मुस्लिम जोगी ग्रामीण सीमा से बाहर कर देते थे।
मंत्रः-
कांगरू देष मे कुमका देवी,जहा बसे इस्माईल जोगी
इस्माईल जोगी वाई वाडी,बाडी मे निपजे लौंग सुपारी
एक ही लौंग राती माती, दुजी लौंग बतावे साथी
तीजी लौंग झीले अजराती,चैथी लौंग आप की सेज छोड
हमारी सेज आवे,रंडी फाट फुट मर जावे,काडजो टुट जमीं
गिर जावे, इस काम को कोन सुधारे,वीर हनुमान आप
सुधारे,सुती को जगावे बैठी की बांह पकड लावे………………..
जिससे गावं मे जोगी को प्रत्येक घर से फसल उठने के
मोके पर लगान बतौर पाॅच पुळी,त्यौहारो के अवसर पर
जोगी को अच्छा पकवान भी मिलता है।
मुस्लिम जोगियो के षादी विवाह मुस्लिम परम्परा के
अनुसार होने लगें।
मुस्लिम जोगीयो के वाद्य यत्र
जोगिया सांरगीः-जोगिया सांरगी का मेवात अंचल मे
अलग महत्व है। जोगिया सांरगी को तीन भागो मे बांटा
गया है। 1.सिर 2. गर्दन 3. पेट
जोगिया सांरगी तुन लकडी की बनाई जाती थी। पेट
खोखला होता था। पेट पर बकरे का चमढा मंढा जाता
था। पेट के नीचे लकडी का ही हुक जैसा बनाया जाता
था। जिसमे तार बांधकर चमडे के उपर लकडी की घोडी
बनाई जाती है। सुविधानुसार छेद कर दिये जाते है। गर्दन
का पिछला भाग खोखला होता है। जिसमे तुरूप के तारो
को बांधने के लिये विशम सख्या मे 5 से 13 तक छेद कर
खुटी डाली जाती है। पुरानी सांरगीयो मे तुरूप की खुटी
नही होती थी।
सांरगी के सिर मे तीन बडी खुटीया होती है। जिनको कान
भी कहते हैं। खुटीयो मे तार बांधकर सांरगी के मुख से
निकाल कर घोडी के उपर से नीचे वाले हुक मे बांध दिया
जाता है।
जोगिया सांरगी को गज द्धारा बजाया जाता है। गज मे
बकरे के बाल बांधे जाते है।

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